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आलेख

इण्डिया की चकाचौंध और गांव की बदहाली

भारत के विकास के बारे में  जो आंकड़े जारी किये जा रहे हैं, उनमें बताया जा  रहा है कि 2017 तक देश में सबसे ज्यादा अरबपति होंगे। लेकिन गांवों का क्या होगा? यह कोई नहीं बता रहा है। इसपर सभी मौन हैं। सच्चाई यह है कि भारत के गांव आज भी बदहाल हैं। एक ओर जहां इण्डिया के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की  दर 9.5 प्रतिशत रहने और चालू मूल्य पर प्रति व्यक्ति आय के 29642 रूपये रहने की बात कही जा रही है।वहीं भारत  के गांव मे 22 प्रतिशत लोग रोजाना महज 12 रूपये  खर्च करते हैं और गांव में आज भी 42 प्रतिशत लोगों को तो बिजली भी मयस्सर नहीं है। दलाल स्ट्रीट की रौनक बढी है तो किसानों की बदहाली जारी है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की रिपोर्ट के अनुसार गांवों के 74 प्रतिशत लोग अभी भी रसोई गैस कनेक्शन का इंतजार कर रहे हैं। संगठन की रिपोर्ट के अनुसार कर्नाटक के गांवों में प्रति व्यक्ति मासिक आय 573 रूपय है जबकि शहरी क्षेत्रों में 1165 रूपये। मध्य प्रदेश के गांवों में प्रतिव्यक्ति मासिक आय 487 रूपये जबकि शहरी क्षेत्रों में 982 रूपये है। झारखण्ड के गांवो में प्रतिव्यक्ति मासिक आय 489 रूपये तथा शहरों में 1082 रूपये है। जबकि बिहार के गांवों में प्रतिव्यक्ति मासिक आय 465 रूपये और शहरों में 684 रूपये है।

जाने माने पत्रकार और मैग्सेसे पुरस्कार  से सम्मानित पी.साईनाथ के अनुसार देश के गणतंत्र बनने के साथ लोगों ने खुशहाली और समान हक का सपन देखा था। लेकिन वक्त गुजरने के साथ यह व्यवस्था सत्ता और साधन की दासी बनकर रह गई। गरीब और अमीर की खाई और चौड़ी होती  गई। इस व्यवस्था से आम आदमी स्वयं को ठगा हुआ महसूस  कर रहा है। शहरों में सुविधाएं और प्रतिव्यक्ति आय बढ़ती जा रही है। दूसरी ओर गरीबों और गांवों में रहने वालों को बुनियादी सुविधायें भी मयस्सर नहीं हैं। देश में जब सकल  घरेलू उत्पाद की विकास दर 9.5 रहने की बात कही जा रही है, वहीं किसानों की आत्महत्या की बात सामने आ रही है। (साभार- ग्राम चौपाल)

पंचायती राज संस्थाओं के प्रतिनिधियों में क्षमता विकास के लिए प्रशिक्षण की महत्ता

- अनुपमा वी.चन्द्रा ( उपनिदेशक-मीडिया एवं संचार, पीआईबी)

राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरीय अनेक मंचों पर पंचायती राज  संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों और स्थानीय प्रशासन में कार्यशील  कर्मचारियों को क्षमता विकास सहायता उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया गया है। अभी हाल ही में जिला तथा मध्यवर्ती पंचायतों के अध्यक्षों का दिल्ली में एक तीन दिवसीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमे 26 राज्यों एवं सघ शासित क्षेत्रों के 8 हजार से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस अवसर पर दो रिपोर्ट भी जारी की गई थी। एक रिपोर्ट दि स्टेट आफ पंचायत्स 2007-2008 थी जिसे प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह ने जारी किया। दूसरी रिपोर्ट पंचायती राज संस्थाओं में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों पर अध्ययन थी। इस रिपोर्ट को यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने जारी किया। इस अध्ययन में कहा गया है कि बेहतर प्रशिक्षण, निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के कार्य प्रदर्शन में एक प्रमुख तत्व के रूप में उभरकर सामने आया है। जिन महिलाओं ने प्रशिक्षण लिया है उन्होंने अपने क्षेत्र में बेहतर कार्य का प्रदर्शन किया है। अतः इस बात की भी शिफारिश की गई है कि न केवल निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए इसे अनिवार्य किया जाए बल्कि इसे नियमित रूप से आयोजित भी किया जाना चाहिए। उसकी बहुपक्षीय विस्तार हो जिसमें नियम-विनियम, बजट एवं वित्त और विकास योजनाओं का कार्यान्वयन भी हो। क्षमता विकास प्रशिक्षण के लिए मुख्य तर्क इस प्रकार हैं-मौजूदा सामाजिक असमानताओं में यह अनिवार्य है कि महिलाओं, अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों को पिछड़ेपन से लड़ने के लिए सहायता दी जाए और आत्मविश्वास के साथ स्थानीय  प्रशासन में भागीदारी के लिए उन्हें सक्षम बनाया जाए। प्रशिक्षण तथा क्षमता विकास पहलों से वे न केवल अपने घरों से बाहर आयेंगीं बल्कि इसके जरिये वे बेहतर भागीदारी के लिए सक्षम हो सकेंगीं।

हमें इस बात को भी अपने दिमाग में रखना है कि स्थानीय प्रशासन व्यवस्था में भाग लेने वाले बड़ी संख्या में हैं जो पहली बार इसमें भाग ले  रहे हैं। अतः उनके कौशल अनुभव को बढ़ाने की बेहद जरूरत है, और उन्हें आवश्यक एवं उचित सूचना मुहैया कराई जाए तथा उन्हें ताजा जानकारी से लगातार अवगत कराया जाता रहे। 73 वें संविधान संशोधन की भावना के दायरे में ही स्थानीय प्रशासन व्यवस्था का स्थिरीकरण करते हुए स्थानीय  नेतृत्व के सृजन के लिए क्षमता विकास प्रयासों की भी जरूरत है, जो असमानता तथा अन्याय में परिवर्तन लाये जोकि अभी देश में मौजूद है। साथ ही इसी समय अधिकतर सरकारी अधिकारियों के लिए शक्तियों का अधोहस्तांरण एक नई अवधारणा है। विकेन्द्रीकरण तथा शक्तियों का अधोहस्तांरण के कार्य करने के विभिन्न तरीकों की जरूरत है और उनके व्यवहार तथा दृष्टिकोण में परिवर्तन लान के लिए प्रशिक्षण की भी जरूरत है। ताकि वे स्थानीय प्रशासन कार्य को प्रभावी बना सके। विकेन्द्रीकरण तथा शक्तियों का अधोहस्तांरण को गरीबी उपशमन,सीमान्त वर्गों की भागीदारी को बढ़ाने के लिए और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तथा बड़ी जिम्मेदारियों को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक माना गया है। विकेन्द्रीकरण के लिए गति बल, जोकि बहुपक्षीय तथा द्विपक्षीय संस्थाओं द्वारा आगे बढ़ाया गया है, को बहुत माना गया है। यदि आवश्यक तकनीक शर्तें पूरी कर दी गईं हों तो भागीदारी तथा जवाबदेही अपने आप ही आ जाएगी। हालांकि विद्वान तथा कार्यकर्ता गवर्नेंस के मुद्दे पर कार्य कर रहे हैं। साथ ही साथ  महिलावादी लेखन तथा विचार ने विकेन्द्रीकरण के विश्वास को राज्य की संस्थाओं का केवल तकनीकि पुनर्गठन मानने को चुनौती दी है। संस्थाओं मे लिंग विचारधारा के आसपास ही सारी कवायद केंन्द्रित रहती है। जो इस बात को सिद्ध करती है कि किसी भी संस्थागत प्रबंधन के लिए प्रक्रियाओं तथा लिंग एजेण्डा को प्राथमिकता प्रदान की जा रही है। महिलाओं अनुसूचित जाति तथा अनूसूचित जनजाति के सदस्यों की उपस्थिति की आशा अपने आप ही विकास विकास के एजेण्डा की तरफ ले जाएगी। इस बात को भी समझना जरूरी है कि यहां पर अन्य परिस्थितियों के साथ-साथ किसी भी प्रकार का महत्वपूर्ण परिवर्तन होना आवश्यक है। क्षमता विकास प्रक्रिया में यह भी अपेक्षित है कि सरकारी नौकरशाही में ऊपर से  लेकर निचले स्तर तक एक उचित परिप्रेक्ष्य स्थापित किये जाने की जरूरत है।

पंचायत प्रतिनिधि प्रशिक्षण - केरल एक उदाहरण

केरल स्थानीय स्वशासन विभाग के अधीन एक स्वायत्त संस्थान कार्य करता है जिसका नाम है केरल स्थानीय प्रशासन संस्थान (केआईएलए)। इस संस्थान की स्थापना 1990 में प्रशिक्षण सुविधा, अनुसंधान, दस्तावेजीकरण और स्थानीय प्रशासन के बारे में विचार विमर्श के लिए की गई थी। इसके अलावा यह संस्थान विकेन्द्रीकरण के मुद्दे पर राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर की कार्यशालाओं और सेमिनारों का भी आयोजन करता है। यह संस्थान आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडू के लिए क्षेत्रीय संसाधन केन्द्र है। जीवन के सभी पक्षों, जैसे आर्थिक, सामाजिक,राजनीतिक तथा तकनीक आदि मे हो रहे परिवर्तनों को अपनी मान्यता देते हुए केरल ने लोगों के विभिन्न् वर्गों को व्यापक प्रशिक्षण देने के लिए योजना बनाई है। केआईएलए के प्रशिक्षण तथा क्षमता विकास प्रयासों को इस प्रकार से डिजाइन किया गया है कि पूरी केरल विकास योजना के प्रति तार्किक एवं लगातार सहायता को सुनिश्चित किया जा सके। केआईएलए राज्य सरकार और स्थानीय निकायो के साथ करीबी स्तर पर मिलकर कार्य कर रहा है। विभिन्न कार्य वर्गों में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों से जो फीडबैक मिल रहा है उससे राज्य सरकार को नीतियों  के निर्माण में सहायता मिल रही है। स्थानीय शासन,तकनीकी सलाहकार समिति तथा तकनीकी समिति के सदस्यों को जगह-जगह चलाए जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रमो में शामिल किया जा रहा है। यह कार्य क्षेत्रीय, जिला तथा ब्लाक स्तर पर किया जा रहा है। केआईएलए निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए स्थानीय प्रशासन पर एक 10 महीने का प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाता है ताकि ये प्रतिनिधि तुच्छ राजनीति से ऊपर उठ सकें और अपने कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से निर्वहन कर सकें। इसे दूरस्थ एवं संपर्क कार्यक्रम के रूप में डिजाइन किया गया है। इसमें परिसर से  बाहर जाकर अध्ययन करना तथा अनुसंधान कार्य भी शामिल है। जो लोग यहा प्रशिक्षण पूरा कर लेते हैं उन्हें विभिन्न स्तरों पर तकनीकी सलाहकार समितियों के सदस्यों के रूप में तथा वरिष्ठ प्रशिक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया जाता है।

केआईएलए प्रत्येक दो महीने में एक बार विकेन्द्रीकृत शासन पर एक राष्ट्रीय स्तर का पाठ्यक्रम चलाता है। यह पाठ्यक्रम केरल में स्थानीय निकायों की कार्यविधि के बारे में जानकारी प्राप्त  करने का अवसर प्रदान करता है। विभिन्न राज्यों के नीति निर्माता, अधिकारी और निर्वाचित सदस्य इन कार्यक्रमों में नियमित रूप से भाग लेते हैं। यह विकेन्द्रीकरण पर राष्ट्रीय  एवं अन्तरराष्ट्रीय कार्यक्रम भी चलाता है। जिसमे सार्क देशों पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और बंगलादेश के निर्वाचित प्रतिनिधि तथा अधिकारी शामिल होते हैं। केरल में कम से कम दो सौ पंचायतें हैं, जिन्होंने अपने यहां अभिनव कार्यक्रम चला रखे हैं। ऐसी पंचायतें जो विचारों , क्षमताओं, सेमिनारों, कार्यशालाओं और अवसर के क्षेत्र में पिछड़ी हुई  हैं, उन्हें प्रेरणा देने था एक दूसरे से परिचित कराने के लिए उनका अच्छा प्रदर्शन कर रही पंचायतों के साथ संपर्क बनाया जा रहा है। (साभारः पीआईबी)