Indian rural News Agency
सम्पादकीय

Published on 02 October 2012

तकनीकी युग में भी प्रासंगिक गांधी दर्शन

            महात्मा गांधी का दर्शन आज भी प्रासंगिक है। आज तकनीक का युग है। विकास की संभावनाओं और योजनाओं में तकनीक का अहम् स्थान हो गया है। इस तकनीकी विकास के माडल और सिध्दान्त में जहां मशीनीकरण ने गहरी पैठ बनाई है वहीं सूचना प्रौद्योगिकी ने विकास के नए द्वार खोले हैं। हमें तकनीक और सूचना तंत्र के सहयोग से विकास और सामाजिक समृध्दि के प्रमाण मिल रहे हैं। किन्तु इस विकास का लाभ उच्च वर्ग और सरकारी नौकरियां प्राप्त वर्ग को ही मिल पा रहा है। समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो आज भी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहा है। उसके पास भरपेट भोजन, शिक्षा स्वास्थ्य और आवास की समस्या है। उसके लिए आजादी केवल सरकारी स्वशासन से अधिक कुछ नहीं है। वह आर्थिक गुलामी का आज भी शिकार है। वस्तुत: समाज के दो वर्ग बन गए हैं। एक सम्पन्न वर्ग और एक वंचित वर्ग। इन दो वर्गों का अन्तर कम होने के बजाय बढ़ रहा है। सरकारें घोषणाएं कर रही हैं। हमारा सकल घरेलू उत्पाद बढ़ रहा है। जीडीपी की विकास दर प्रतिवर्ष उन्नति कर रही है। किन्तु इस बात का कोई जबाव नहीं है कि जीडीपी में उन्नति के बाद भी किसान क्यों आत्महत्या कर रहे हैं? भुखमरी की समस्या आज भी क्यों बनी हुई है?

इस सबका उत्तर है देश में गांधी दर्शन की उपेक्षा। हमने न केवल गांधी को भुला दिया बल्कि उनके दर्शन की भी भरपूर उपेक्षा की है। गांधी ने जो दर्शन दिया वह सच्चे माने में भारत के विकास का दर्शन था। महात्मा गांधी ने इस देश की आत्मा को समझा था। उन्होंने जान लिया था कि भारत का विकास केवल भारतीयों द्वारा संचालित भारत सरकार के द्वारा नहीं होगा। इसके लिए शासन व्यवस्था और योजनाओं के क्रियान्वयन में मूलभूत परिवर्तन करना पड़ेगा। इसी के लिए उन्होंने ग्राम स्वराय की कल्पना की थी। गांधी दर्शन गांव के विकास का दर्शन है। आम भारतीय यानि यहां के किसान, मजदूर का उत्थान करने का दर्शन है। महात्मा गांधी दूरदर्शी और स्वप्नदृष्टा थे। उन्होंने दुनिया में वैज्ञानिक और तकनीकी विकास की संभावनाओं के आगमन का अनुभव कर लिया था। इसीलिए उन्होंने कृषि में यंत्रीकरण के उन्मुक्त प्रयोग को नियंत्रित करने की बात कही थी। उन्होंने खेती में रासायनिक खादों से भी परहेज और उसकी उर्वरा शक्ति बनाये रखने के लिए पारंपरिक गोबर खाद को प्राथमिकता देने की बात कही थी। गांधी ने कल कारखानों पर निर्भर होने और विदेशी सामानों से बचने के लिए ही खादी पहनने और चर्खा चलाने की प्रेरणा दी थी। चर्खा और खादी स्वदेशी अपनाने के प्रतीकात्मक संदेश हैं।

लेकिन हमने क्या किया? गांधी के स्वदेशी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के चिंतन को बिसार दिया। इसके दुष्परिणाम सामने हैं। हम कृत्रिम तरीके अपनाकर अन्न उत्पादन बढ़ा चुके हैं किन्तु पूरे देश की आबादी की भूख अभी तक नहीं मिटा सके हैं। हम रायायनिक खेती के दुष्परिणाम गंभीर रोगों कैंसर, हृदयरोग के रूप में देख रहे हैं। स्वदेशी सामान को भूलकर विदेशी वस्तुओं पर निर्भर होकर बेरोजगारी को बढ़ता हुआ देख रहे हैं। यदि हमने सही मायने में गांधी को जानने समझने और उनके बताये मार्ग पर चलने का प्रयास किया होता तो गांधी का यह देश आज सही मायने में विकसित हो गया होता।

अन्यत्र

नेता जी ने कहा सबसे पहले गांधी को राष्ट्रपिता

 

महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि आजाद हिन्द फोज के संस्थापक और क्रांतिकारी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने दी। उन्होंने ही सबसे पहले महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता के रूप में सम्बोधित किया था।

नेताजी ने 1943 में ही अण्डमान निकोबार द्वीप समूह व कोहिमा को आजाद कराकर तिरंगा फहरा दिया था। उन्होंने 1943 में ही सिंगापुर रेडियो से प्रासरण में महात्मा गांधी को सर्वप्रथम राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित किया था। इसका उल्लेख आजाद हिन्द फौज के सेनानी एवं नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के सहयोगी पूर्व राजदूत आनन्द मोहन सहाय ने एक साक्षात्कार में किया था।  

किसान आन्दोलन में लोकदल सबसे आगे

Farmers agitation , RLD with lead

-सर्वेश कुमार सिंह-

Lucknow, August 27,2010. Uttar Pradesh Samachar Sewa-UPSS-U.P.Web News-Indian Rural News Agency-IRNA-NEWS

लखनऊ, 27 अगस्त। (उप्रससे)। प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह द्वारा कृषि भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 में परिवर्तन करने के आश्वासन से आन्दोलनरत किसानों को आशातीत सफलता मिलने के आसार बने हैं। इस कानून में बदलाव के साथ ही किसान आधी लड़ाई जीत लेंगे। लड़ाई का शेष हिस्सा प्रदेश सरकार से सम्बन्धित है। क्योंकि मुआवजा बढ़ाने की मांग को पूरा करने का काम प्रदेश सरकार का है। इस मांग को पूरा करने के लिए किसानों का टप्पल (अलीगढ़) में अनिश्तिचकालीन धरना जारी है। हालांकि इस मांग पर प्रदेश सरकार दबाव में है तथा वह हर संभव प्रयास कर रही है कि किसानों को बेहतर मुआवजा देकर यमुना एक्सप्रेस-वे की रुकावटें दूर कर दी जाएं। दोनों मांगों को पूरा कराने के लिए संघर्ष समिति ने आन्दोलन का बिगुल बजाया हुआ है। इस आन्दोलन में किसानों की रहनुमाई के लिए सभी राजनीतिक दल आगे आये हैं। लेकिन, आन्दोलन की अगुआई और किसानों के संघर्ष में शामिल होने से लेकर उसे सफलता की सीढ़ियों को ओर बढ़ाने में राष्ट्रीय लोकदल का विशेष योगदान है। किसानों और मीडिया के बीच भी यही संदेश गया है कि लोकदल ने किसानों के संघर्ष को गति प्रदान की।

                जयप्रकाश एसोसिएट की कम्पनी जे.पी.इन्फोटेक प्रा.लि. द्वारा बनाये जाने वाले 165 किमी लम्बे यमुना एक्सप्रेस-वे  में जा रही जमीन बचाने तथा कम मुआवजे के खिलाफ आन्दोलन कर रहे किसानों का सबसे पहले लोकदल ने ही समर्थन किया था। यह आन्दोलन 14 अगस्त की घटना से करीब एक महीने पहले से चल रहा है। किसानों की जमीनों पर बगैर करार के प्रशासन और जे.पी.ग्रुप द्वारा कब्जा किया जा रहा था। उसी समय किसानों ने आन्दोलन की शुरुआत कर दी थी। लेकिन तब राजनीतक दलों में अकेले लोकदल ने समर्थन की घोषणा की थी। यमुना एक्सप्रेस-वे से प्रभावित होने वाले अलीगढ़, आगरा, मथुरा, नोएडा के 1182 गांवों के किसानों की समस्याओं को अकेले लोकदल ने विधान सभा के मानसून सत्र में उठाया था। लोकदल ने इस पर काम रोको प्रस्ताव भी पेश किया। सत्र में 11 अगस्त को लोकदल ने प्रदेश में बन रहे आठ एक्सप्रेस-वे से किसानों के प्रभावित होने तथा प्रदेश में कृषि की बदहाली का मामला उठाया। रालोद के नेताओं कोकब हमीद, डा.अनिल चौधरी, डा.अजय तोमर और सत्येन्द्र सिंह सोलंकी ने यमुना एक्सप्रेस-वे के लिए अधिग्रहीत की जा रही जमीन पर जबरन कब्जे और वहां चल रहे आन्दोलन की भी विस्तार से जानकारी दी थी।

                रालोद नेताओं ने एक्सप्रेस-वे के साथ-साथ बनने वाली हाईटेक टाउनशिप पर सवाल खड़े किये थे। उन्होंने आंकडे पेश कर बताया था कि इन आठ एक्सप्रेस-वे से लगभग 25 हजार गांवों का अस्तित्व ही मिट जाएगा। इन गांवों के किसान और उनके परिवार बेरोजगार हो जाएंगे। इससे एक ओर अराजकता बढ़ेगी और कानून व्यवस्था की स्थिति खराब होगी तो दूसरी ओर खाद्यान्न का संकट खड़ा होगा। नेताओं ने बताया कि  एक किमी एक्सप्रेस-वे बनने पर औसत 7.2 गांव प्रभावित होंगे। चर्चा में डा.अनिल चौधरी ने सदन में बताया था कि टप्पल में यमुना एक्सप्रेस-वे के लिए प्रस्तावित जमीन में किसानों का करार हुए बिना ही उनकी खसरा खतौनी पर यमुना एक्सप्रेस-वे दर्ज किया जा रहा है। हालांकि इस चर्चा पर सरकार की ओर से सीधा सा जबाव आया था कि किसानों की भूमि का अधिग्रहण नियमानुसार किया जा रहा है। उस समय सरकार ने इस आन्दोलन और सदन की चर्चा पर ध्यान नहीं दिया। यदि किसानों की मांगों पर उसी समय गम्भीरता से विचार कर लिया जाता और प्रशासन संवेदनशीलता के साथ टप्पल के किसानों से बातचीत कर लेता तो 14 अगस्त की फायरिंग की  घटना न होती।

                यमुना एक्सप्रेस-वे (पूर्व में ताज एक्सप्रेस-वे) के विरोध और मुआवजे के सवाल पर किसानों पर फायरिंग के बाद सभी दलों के नेताओं ने सहानुभूति प्रदर्शित की। लेकिन,ं आन्दोलन को दिशा देने में भी लोकदल ही आगे रहा। रालोद के नेता जयंत चौधरी सबसे पहले किसानों के बीच पहुंचे। इसके बाद रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजित सिंह ने ही 17 अगस्त को प्रदेश में चक्का जाम और संसद घेराव की घोषणा की थी । बाद में कांग्रेस, भाजपा ने भी प्रदेश बंद का समर्थन किया। संसद घेराव में भाजपा और वामदल भी रालोद के साथ रहे। लेकिन दिल्ली में 26 अगस्त के प्रदर्शन में रालोद के नेता व कार्यकर्ता ही सबसे आगे थे। बसपा संसद घेराव में समर्थन की घोषणा करके भी दूर रही। जबकि कंाग्रेस ने संसद घेराव को औचित्यहीन बताया। बल्कि कांग्रेस ने तो एक दिन पहले ही किसानों के कुछ प्रतिनिधियों के साथ राहुल गांधी की प्रधानमंत्री से वार्ता करा दी। इस वार्ता में प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह ने भूमि अधिग्रहण कानून 1894 में संशोधन का आश्वासन दे दिया। यह मुलाकात संसद घेराव कार्यक्रम का प्रभाव कम करने के लिए कराई गई थी। इसका श्रेय भी लोकदल की अगुआई में शुरु हुए आन्दोलन को ही जाता है।

 

उत्तर प्रदेश आजकल

दलों के आपसी टकराव में उलझा किसान आन्दोलन

-सर्वेश कुमार सिंह-

खेती की जमीन बचाने के लिए अलीगढ़ के टप्पल से शुरु हुआ किसान आन्दोलन राजनीतिक दलों के आपसी टकराव में उलझ गया है। दलों के निजी स्वार्थ के चलते इस आन्दोलन के राह से भटक जाने का भी खतरा मंडरा रहा है। दलों ने आन्दोलन को किसानों की समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट करने की बजाय इस पर राजनीति शुरु कर दी है। राजनीतिक दलों की कोशिश यह है कि वे कैसे दूसरे दल को आरोपित करके और उसे किसान विरोधी बताकर स्वयं को किसान हितैषी साबित करें। इस होड़ में प्रदेश की सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी और केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी सबसे आगे है। ये दोनों दल अब किसानों की मूल समस्या से ध्यान हटाकर इस बात उलझे हुए हैं कि संसद घेराव और प्रदेश बंद के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह कैसे लगाया जाए।

                ज्ञातव्य है कि प्रदेश में 14 अगस्त को अलीगढ जिले के टप्पल और जिकरपुर में किसानों पर फायरिंग के बाद देश का ध्यान इस ओर गया है। इस इलाके के किसान करीब दो सप्ताह से यमुना एक्सप्रेस-वे (पूर्व में ताज एक्सप्रेस-वे) के लिए अधिग्रहीत की जा रही 2500 हेक्टेयर जमीन को बचाने के लिए आन्दोलन कर रहे थे। एक्सप्रेस-वे से 1182 गांव प्रभावित होने हैं तथा लगभग 125 गांवों का वजूद ही समाप्त हो जाएगा। एक्सप्रेस-वे की लम्बाई 165 किमी है। किसानों से जोर जबरसदस्ती करार पर हस्ताक्षर कराये जा रहे थे। उनकी जमीन पर बगैर कब्जा लिये ही प्रदेश सरकार और निर्माणकर्ता जे.पी. (जयप्रकाश एसोसिएट) ने फसलें उजाड़ दी थीं। टयूब उखाड़ दिये थे। पेड़ काट डाले थे। किसान विरोध कर रहे थे। लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था। उस समय इन किसानों की न तो प्रदेश सरकार और न ही उसके अफसरों ने और न ही विपक्ष के किसी दल ने सुधि ली।

                अब जबकि तीन किसानों तथा एक जवान की मौत के बाद यह आन्दोलन उग्र हो गया और यह चुनावी मुद्दा बन गया तो सभी दल इसमें कूद पड़े हैं। आन्दोलन अब राजनीतिक रूप लेने लगा है। इस आन्दोलन में सभी राजनीतिक दल अपना भविष्य देख रहे हैं। कोई भी दल किसान हितैषी साबित होने तथा दूसरे को किसान विरोधी साबित करने में पीछे नहीं रहना चाहता। इसके लिए जो भी संभव है वह हथकण्डा अपनाया जा रहा है। इसी कड़ी में कांग्रेस, बसपा और सपा एक दूसरे को किसान विरोधी साबित कर रहे हैं।

                किसानों पर फायरिंग के बाद भूमि का मुआवजा बढ़ाने तथा किसानो की मागें मानने के लिए केैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने जो प्रस्ताव रखे थे। उन्हें खारिज करने के बाद किसानों ने अपने आन्दोलन की दिशा तय कर दी है। किसानों ने अपना नया नेता चुन कर किसान संघर्ष समिति गठित कर ली। इसके बनैर तले आन्दोलन करने का फैसला किया। किसानों ने दो सूत्री मांगें रखी। एक- प्रदेश की बसपा सरकार को बर्खास्त किया जाए। दूसरी - सवा सौ साल पुराने भूमि अधिग्रहण कानून को बदला जाए। संघर्ष समिति ने आन्दोलन की रूपरेखा में दो कार्यक्रम तय किये। पहला 25 अगस्त को प्रदेश बंद और दूसरा 26 अगस्त को संसद घेराव। आन्दोलन को सभी दलों काग्रेस,भाजपा,रालोद,सपा और बसपा ने समर्थन दिया।

                किसानों के इस आन्दोलन के कार्यक्रम में ही राजनीतिक दल  उलझ गए। किसानों के आन्दोलन में सभी दलों ने सहभागिता करने का फैसला किया। किन्तु दो मांगें ,  दो दलों लिए परेशानी का सबब बन गईं। प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी ने जहां पासा पलटते हुए किसानों के संसद घेराव को समर्थन देने तथा उसमें शामिल होने की घोषणा कर दी। वहीं कांग्रेस ने संसद घेराव को औचित्यहीन करार दिया है। इसी तरह प्रदेश सरकार ने प्रदेश बंद को औचित्यहीन करार दिया तो कांग्रेस ने प्रदेश बंद को समर्थन प्रदान किया। इसके वरिष्ठ नेताओं ने दादरी में धरना दिया। कांग्रेस के नेताओं ने तो साफ कहा कि आन्दोलन प्रदेश सरकार के खिलाफ होना चाहिए। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव ने कहा है कि संसद घेरने के बजाय किसानों पर गोली चलाने वाली सरकार की बर्खास्तगी के लिए प्रदेश की विधान सभा का घेराव किया जाना चाहिए।

                उधर बसपा की प्रमुख मायावती का कहना है कि केन्द्र सरकार की लापरवाही से किसान आन्दोलित हैं। क्योंकि केन्द्र की सरकारों ने आज तक भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन नहीं किया है। भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन कराने के लिए बसपा किसानों के साथ है और संसद घेराव में साथ देगी। जबकि सपा ने अपने आन्दोलन की रूपरेखा ही बदल दी। सपा ने किसानों की मांगों का तो समर्थन किया किन्तु न तो प्रदेश बंद में शामिल हुई और न ही वह संसद घेराव में हिस्सा लेगी। सपा का कहना है कि वह उस आन्दोलन में शामिल नहीं होगी जिसमें बहुजन समाज पार्टी शामिल हो। सपा ने अलग से एक दिन का धरना प्रदर्शन करने का फैसला किया है।

                किसानों के हितैषी साबित होने के लिए आन्दोलन में भागीदारी कर रहे सभी राजनीतिक दलों ने किसान समस्याओं की उपेक्षा की है। कृषि भूमि अधिग्रहण के लिए लागू जिस कानून को बदलने की आज बात हो रही है। उसे बदलने के लिए कांग्रेस, जनता पार्टी, संयुक्त मोर्चा, भाजपा की के न्द्र में रही सरकारों ने कभी कोशिश ही नहीं की। केन्द्र में सभी दलों की सरकारें रहीं या दल किसी न किसी गठबंधन में शामिल रहे। किसानों की जमीनें उद्योगपतियों को देने में भी इन पार्टियों की सरकारों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। आज बसपा जे.पी.ग्रुप ( जयप्रकाश एसोसिएट) पर मेहरबान है तो कल सपा ने रिलायंस को खुले हाथ से खेती की जमीन बांटी थी। कांग्रेस ने तो देशभर में एसईजेड के नाम पर हजारों एकड़ जमीन उद्योगपतियों को दे दी।

                अलबत्ता अब किसान जागा है तो राजनीतिक दल सही रास्ते पर हैं। इस आन्दोलन की बदौलत ही देश का ध्यान कृषि भूमि के औचित्यहीन अधिग्रहण की ओर गया है। जनता में भी यह चिंता सताने लगी है कि जमीन घटती जाएगी तो खाने को कहां से आएगा? इसके अच्छे परिणाम निकलेंगे। सरकार भूमि अधिग्रहण कानून बदलेगी और किसानों को कुछ राहत मिलेगी। लेकिन इस सबके लिये जरूरी होगा किसान आन्दोलन को गैरराजनीतिक रखना ।   (26 अगस्त, 2010-उप्रससे)।

 

यह कैसा विकास  ?

उत्तर प्रदेश में विकास के नाम पर कृषि और किसानों को बर्बाद किया जा रहा है। प्रदेश में एक्सप्रेस वे और हाईटेक टाउनशिप की चकाचौध कृषि का स्वरूप ही बिगाड़ देगी। आखिर यह कैसा विकास होगा जिसमें कृषि जमीन घटती जा रही है, अन्न उत्पादन आबादी के अनुपात में बढ़ नहीं रहा है। किसानों में बेरोजगारी बढ़ रही है। इस विकास से आने वाले समय मं हमें तथा हमारी पीढियों को पछताना पड़ेगा। यदि हम कृषि को बचाने के लिए अभी नहीं चेते तो फिर बहुत बड़े संक्ट का सामना करना पड़ेगा।

उ.प्र.में आकार ले रहा है बड़ा किसान आन्दोलन

-सर्वेश कुमार सिंह-

लखनऊ, 17 अगस्त। (उप्रससे)। उत्तर प्रदेश में बड़ा किसान आन्दोलन आकार ले रहा है। आन्दोलन किसानों की जबरन भूमि अधिग्रहण, कम मुआवजा और गांवों के उजाडे जान के बाद विस्थापन की समस्याओं के समाधान के लिए किया जाएगा। इसके संकेत राष्ट्रीय लोकदल ने दिये हैं। रालोद किसान समस्याओं पर मुखर रहा है। हाल ही में आहूत हुए विधान मण्डल के मानसून सत्र में भी रालोद ने किसानों की समस्याओं को प्रमुखता से उटाया था।

          प्रदेश के किसानों के सामने उनके अस्तित्व का संकट है। राय को चमकाने, बड़ी-बड़ी चौड़ी सड़केंं बनाने के लिए आठ ए्क्सप्रेस वे बनाये जाने प्रस्तावित हैं। इन एक्सप्रेस वे के को बनाने वाली निजी कम्पनियों को इनके आस पास हाई टेक टाउनशिप भी विकसित करने का मौका दिया जा रहा है। इसके लिए सरकार ही जमीन अधिग्रहण करके देगी। यह अधिग्रहण भी सरकार अपने मूल्य पर करेगी न कि बाजार मूल्य पर । राय का पहले तो अपनी उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण ही नहीं होने देना चाहता है। यदि अधिग्रहण अपरिहार्य कारणों से विकास के लिए होता भी है तो उसे उतना मुआजवा अवश्य मिले जितना राय के अन्य स्थानों पर विशेष कर नोएडा के किसानों को दिया गया है। ये मुद्दे काफी समय से किसानों, किसान संगठनों तथा राष्ट्रीय लोकदल द्वारा उठाये जा रहे थे। किन्तु सरकार ने इन पर ध्यान नहीं दिया। यदि सरकार चेती होती स्थिति इतनी गम्भीर नहीं होती जितनी कि अलीगढ़ में हो गई है।

          अलीगढ़ के टप्पल और जिकरपुर समेत छह गांवों में दो सप्ताह से आक्रोश था, जहां के किसानों की लगभग पांच सौ हेक्टेयर जमीन यमुना एक्सप्रेस परियोजना में शामिल हाईटेक टाउनशिप के लिए अधिग्रहीत की जानी है। किसान धरना दे रहे थे। अपनी जमीन वापस लेन के प्रयास कर रहे थे। आन्दोलनकारी किसानों ने एक सप्ताह पहले ही सरकार से अपनी जमीन छीनने का प्रयास किया था। लेकिन सरकार द्वारा आन्दोलन की उपेक्षा किये जाने से क्षुब्ध किसानों को सीधे संघर्ष का रास्ता अपनाना पड़ा। इसका परिणाम यह हुआ कि 14 अगस्त को पुलिस और किसानों के बीच सीधा टकराव हो गया। गोलियां चलीं, लाठी चार्ज हुआ, आसू गैस छोड़ी गई। किसानों ने भी मोर्चा संभाल लिया। एक जवान और तीन किसान मारे गए।

          अलीगढ़ के किसान आन्दोलन में चार के मारे जाने तथा दर्जनों के घायल होने के बाद राजनीति गर्मा गई है। सभी प्रमुख राजनैतिक दलों ने किसानों के प्रति हमदर्दी जतानी शुरु कर दी है। रालोद, भाजपा, कांग्रेस और सपा के नेता तत्काल मौके पर पहुंचे । लेकिन इस आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए विस्तृत रूप रेखा राष्ट्रीय लोकदल के अजित सिंह ने प्रस्तुत की है। उन्होंने कहा कि यदि सभी दल एकजुट होकर आन्दोलन करें तो बड़ा किसान आन्दोलन खड़ा किया जा सकता है। श्री सिंह ने कल अलीगढ़ में कहा कि किसानों के सामने तीन विकल्प हैं। एक- किसान दिल्ली का घेराव कर लें, दो-किसान अलीगढ़ कूच करें तीसरा प्रदेश में किसानों की समस्याओं पर जगह जगह चक्का जाम। इसके अलावा कांग्रेस ने भी राय के जिला मुख्यालयों पर धरना प्रदर्शन की घोषणा कर दी है। सपा भी इस मुद्दे पर आगे आने की कोशिश में है। सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने तो यहां तक कह दिया है कि जिस औद्योगिक समूह जे.पी. को जमीन अघिग्रहीत करके दी जा रही है उसमें मुख्यमंत्री मायावती की अघोषित हिस्सेदारी है। भाजपा ने किसानों के मुद्दे पर लम्बे संघर्ष की रूपरेखा तैयार की है।

          किसानों का यह मुद्दा ऐसे समय पर उभरा है जब राय में सितम्बर-अक्टूबर में पंचायत के चुनाव होने हैं तथा डेढ़ साल बाद विधान सभा के चुनाव होंगे। इस स्थिति को देखते हुए सभी विपक्षी दल किसान हितैषी साबित होने के लिये किसान आन्दोलन खड़ा करने की तैयारी में हैं। यदि किसानों के  मुद्दे पर कोई संघर्ष समिति बनी तो बड़ा किसान आन्दोलन आकार ले सकता है।